“SEBI बोर्ड की बैठक में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए फंड सेटलमेंट नियमों में ढील देने का प्रस्ताव रखा गया है। अब FPIs समान दिन की खरीद-बिक्री ट्रेड्स पर नेट फंडिंग कर सकेंगे, जिससे कैपिटल की जरूरत कम होगी और ट्रेडिंग लागत घटेगी। यह बदलाव भारत में विदेशी निवेश को आकर्षित करने और बाजार की गहराई बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, खासकर जब हाल के महीनों में FPI आउटफ्लो बढ़ा हुआ है।”
SEBI बोर्ड ने हाल ही में महत्वपूर्ण बैठक की, जिसमें विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए कैश मार्केट ट्रेड्स के सेटलमेंट नियमों में प्रमुख बदलाव पर विचार किया गया। वर्तमान व्यवस्था में FPIs को प्रत्येक ट्रेड को ग्रॉस आधार पर सेटल करना पड़ता है, यानी हर खरीद के लिए अलग से फंड जमा करना अनिवार्य होता है, भले ही उसी दिन बिक्री हुई हो। नए प्रस्ताव के तहत ‘नेटिंग ऑफ फंड्स’ की अनुमति दी जाएगी, जिससे FPIs समान दिन की बिक्री से प्राप्त राशि को खरीद दायित्वों के खिलाफ समायोजित कर सकेंगे और केवल नेट पेयेबल अमाउंट ही जमा करना होगा।
यह बदलाव विशेष रूप से उन FPIs के लिए फायदेमंद होगा जो उच्च वॉल्यूम ट्रेडिंग करते हैं, जैसे इंडेक्स फंड्स, ETF ऑपरेटर्स और एक्टिव ग्लोबल फंड्स। वर्तमान में ग्रॉस सेटलमेंट से कैपिटल ब्लॉकेज बढ़ जाता है, जिससे फंडिंग कॉस्ट और ऑपरेशनल जटिलता बढ़ती है। नेट सेटलमेंट से फंडिंग आवश्यकता में 30-50% तक की कमी आ सकती है, खासकर इंडेक्स रीबैलेंसिंग या हाई-वॉल्यूम दिनों में।
SEBI के इस कदम का उद्देश्य विदेशी निवेशकों की भागीदारी बढ़ाना है। 2026 के शुरुआती महीनों में FPI ने भारतीय इक्विटी से भारी निकासी की है, जिसमें मार्च में ही लगभग 88,000 करोड़ रुपये का आउटफ्लो दर्ज हुआ। भू-राजनीतिक तनाव, रुपये की कमजोरी और ग्लोबल अनिश्चितताओं ने इस ट्रेंड को बढ़ावा दिया। लेकिन SEBI के चेयरमैन टुहिन कांता पांडे के नेतृत्व में लगातार सुधार हो रहे हैं, जैसे SWAGAT-FI फ्रेमवर्क के तहत ट्रस्टेड FPIs के लिए रजिस्ट्रेशन को 10 साल तक वैध करना, KYC रिव्यू साइकल को बढ़ाना और सरकारी सिक्योरिटीज में निवेश करने वाले FPIs के लिए कंप्लायंस में छूट।
ये बदलाव FPIs की ट्रेडिंग एफिशिएंसी बढ़ाएंगे और भारत को ग्लोबल इन्वेस्टर्स के लिए ज्यादा आकर्षक बनाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि नेट सेटलमेंट लागू होने से FPI इन्फ्लो में तेजी आ सकती है, क्योंकि यह कैपिटल एफिशिएंसी बढ़ाएगा और ट्रेडिंग कॉस्ट घटाएगा। नए नियम दिसंबर 2026 से लागू होने की संभावना है, जिससे बाजार में लिक्विडिटी और प्राइस डिस्कवरी में सुधार होगा।
प्रमुख बदलावों की तुलना (वर्तमान vs प्रस्तावित)
अन्य संबंधित सुधार जो FPIs को लाभ पहुंचा रहे हैं
| पैरामीटर | वर्तमान नियम (ग्रॉस सेटलमेंट) | प्रस्तावित नियम (नेट सेटलमेंट) | प्रभाव FPIs पर |
|---|---|---|---|
| समान दिन खरीद-बिक्री | हर ट्रेड अलग-अलग फंड जमा अनिवार्य | बिक्री से प्राप्त राशि खरीद के खिलाफ समायोजित | फंडिंग जरूरत 30-50% कम |
| कैपिटल ब्लॉकेज | उच्च, पूरा अमाउंट पार्क करना पड़ता है | केवल नेट अमाउंट पार्क करना | ट्रेडिंग कॉस्ट में कमी, बेहतर कैश मैनेजमेंट |
| ऑपरेशनल जटिलता | अधिक, प्रत्येक ट्रेड इंडिपेंडेंट | कम, नेट कैलकुलेशन से आसान | बड़े फंड्स के लिए फायदेमंद |
| लागू होने की संभावित तिथि | – | दिसंबर 2026 से | बाजार में तत्काल लिक्विडिटी बूस्ट |
SWAGAT-FI के तहत लो-रिस्क FPIs (सरकारी फंड्स, रिटेल फंड्स) के लिए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया सरल, 10-दिन में पूरा।
सरकारी बॉन्ड्स में निवेश करने वाले FPIs के लिए इन्वेस्टर ग्रुप डिटेल्स की जरूरत खत्म।
बजट 2026 में PIS के तहत व्यक्तिगत विदेशी निवेशकों की सीमा 5% से बढ़ाकर 10% की गई, कुल सीमा 10% से 24%।
F&O सेगमेंट में पिछले बदलावों के बावजूद, इक्विटी कैश मार्केट में ये सुविधाएं FPIs को ज्यादा आकर्षित करेंगी।
ये कदम भारत के कैपिटल मार्केट को ग्लोबल स्टैंडर्ड्स के करीब ला रहे हैं। विदेशी निवेशकों के लिए कम लागत और आसान ऑपरेशंस से बाजार में स्थिरता आएगी और लंबे समय में भारतीय निवेशकों को भी फायदा होगा, क्योंकि ज्यादा FPI इन्फ्लो से वॉल्यूम बढ़ेगा और वैल्यूएशन बेहतर होंगे।
Disclaimer: यह लेख समाचार और सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। निवेश से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श लें। बाजार जोखिमों के अधीन है।